आयुर्वेद के ग्रंथों में मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी आदि मूत्रवह संस्थान से संबंधित व्याधियों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। लेकिन इन ग्रंथों में वृक्करोग एवं उनकी चिकित्सा के बारे में अलग से अध्याय का वर्णन नहीं मिलता। वृक्करोग एवं उनकी चिकिस्ता के लिए भैषज्य रत्नावली इस ग्रंथ में एक स्वतंत्र अध्याय का वर्णन मिलता है, जहाँ पर सर्वतोभद्रा वटी का वर्णन किया गया है। वृक्क रोगों से पीडित रुग्णों की चिकित्सा यह एक अत्यंत पेचीदा एवं कठिन विषय है, क्योंकि इन रोगों से पीडित रुग्ण बहुत देर से आयुर्वेद चिकित्सक के पास आते हैं। ऐसे समय अधिक तर रुग्ण डायलेसिस जैसे आधुनिक चिकित्सा उपक्रमों के आधार पर जिंदगी को संभाले हुए रहते हैं। ऐसी अवस्था में आयुर्वेद चिकित्सक के पास उनकी उचित चिकित्सा के लिए बहुत ही कम समय रहता है। अधिकतर रुग्ण धातु क्षय तथा ओज क्षय की गंभीर अवस्था में रहते हैं, जो चिकित्सा की दृष्टि से अत्यंत जटिल अवस्था में पहुँचे हुए होते हैं। वृक्क विकृती का असर अन्य महत्वपूर्ण कोष्ठांगों पर होने से व्याधिसंकर की अवस्था उत्पन्न होती है जो इस रोग को असाध्यता की ओर अग्रेसर क...
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