आत्महत्या (suicide) व्यक्तित्व का ऐसा नकारात्मक पहलू हैं,जो विश्व के प्रत्येक राष्ट्र में घट़ित हो रहा हैं.चाहे राष्ट्र विकसित हो,विकासशील हो,या अल्पविकसित हो. लोग हर परिस्थितियों में अपनें को मौत के आगोश में धकेल रहे हैं,चाहें बीमारी हो,असफलता हो,तनाव हो,अकेलापन हो,सम्मान की हानि हो,बेरोज़गारी हो, अत्यधिक खुशी हो, सफलता का अत्यधिक नशा हो कहनें का तात्पर्य यही हैं,कि लोग हर परिस्थिति में आत्महत्या करतें हैं. लेकिन क्या इन आत्महत्याओं को रोका जा सकता हैं.बेशक रोका जा सकता हैं.जीनें की चाह हर प्राणी में होती हैं.कोई शिशु या अबोध बालक आत्महत्या नहीं करता हैं,आत्महत्या करनें वाला इसके परिणाम के प्रति पूर्व परिचित होता हैं. तो व्यक्तित्व में ऐसा क्या परिवर्तन किया जावें कि आत्महत्या का विचार त्याग दे,कुछ सुझाव निम्न हैं ::: ० जीवन अनमोल हैं ::: आत्महत्या करनें वाला व्यक्ति जीवन को सबसे बड़ा बोझ मानकर इसे समाप्त करनें को तत्पर रहता हैं,लेकिन यदि हम उस व्यक्ति को कुछ बातें समझानें में कामयाब हो गये तो निश्चित रूप से उसे जीवन का निहितार्थ समझ में आ जावेगा जैसे सुख हैं तो दुख हैं...
Healthy lifestyle सामाजिक,मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य उन्नत करते लेखों की श्रृंखला हैं