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पाईल्स या बवासीर या अर्श के कारण ,प्रकार और बीमारी का प्रबंधन

पाईल्स या बवासीर या अर्श के कारण ,प्रकार और बीमारी का प्रबंधन

आयुर्वैद चिकित्सा जिन बीमारींयों के उन्मूलन का दावा करती हैं, उनमें अर्श अर्थात (Piles) पृमुख हैं .अर्श वास्तव में गुदा मार्ग में होने वाली बीमारीं हैं  जिसमें गुदा मार्ग में शोच के वक्त ज्यादा दबाव पड़ने से गुदा मार्ग की रक्त नलिकाएं फूल जाती हैं. और इनमें जलन व खून भी निकलता हैं.
 

आयुर्वेद ग्रन्थों में अर्श का वर्णन करतें हुए लिखा हैं 


अरिवतप्रणानहिंस्ति 

 बवासीर अर्थात अर्श [Piles] वह बीमारी हैं जो प्राणों को इतना कष्ट पहुंचाती है कि व्यक्ति का पूरा ध्यान अपने सामान्य कामकाज से हटकर दुश्मन की भाँति उसी पर लग जाता हैं ।




पाईल्स कैसे ठीक करे
 बवासीर या अर्श

# बवासीर या अर्श के प्रकार :::



बवासीर मुख्यत : दो तरह के होते हैं ::

#1. अंदरूनी बवासीर या अर्श



इस अवस्था में रोगी को रोग की तीव्रता का अंदाज़ा बहुत बाद में चलता हैं ।अंदरूनी बवासीर की भी चार अवस्था होती हैं जो निम्न हैं 




1.प्रथम अवस्था :::



इस अवस्था में गुदामार्ग के अंदर रक्त नलिकाओं पर सूजन होती हैं ,किन्तु दर्द नहीं होता हैं ।कभी मल त्यागते समय मल के साथ रक्त आता हैं ।

यदि समय पर इस अवस्था को पहचानकर इलाज शुरू कर दिया जाये तो ओषधियों द्वारा आसानी से इस बीमारी को ठीक किया जा सकता हैं ।





2.द्वितीय अवस्था :::



इस अवस्था में रक्तनलिकाओं के अंदर सूजन के साथ दर्द भी होता हैं । मल त्यागते समय मस्से बाहर निकलते हैं जो मल त्याग के बाद वापस अंदर चले जाते हैं ।इस अवस्था का भी ओषधियों द्वारा सफलतापुर्वक इलाज किया जा सकता हैं ।




3.तृतीय अवस्था :::


इस अवस्था में मस्से मल त्यागते समय बाहर आ जाते हैं जिन्हें बाहरी दबाव लगाकर ही अंदर किया जा सकता हैं । मस्सों में अत्यधिक तीव्र वेदना होती हैं । साथ ही आँतों में तनाव महसूस होता हैं । 

इस अवस्था की चिकित्सा क्षारकर्म या अग्निकर्म द्वारा सफलतापुर्वक की जा सकती हैं ।



4.चतुर्थ अवस्था :::


इस अवस्था में मल त्यागते समय असीम दर्द होता हैं । मस्से बाहर निकलते हैं जो अंदर नही जा पाते । रक्त भी अधिक निकलता हैं जिससे रोगी के शरीर में खून की कमी हो जाती हैं । रोगी शोच के बाद ठीक से बैठ भी नही पाता हैं ।

इस अवस्था को एक या अधिक बार क्षारसूत्र और लम्बे समय तक ओषधि सेवन के द्वारा ठीक किया जा सकता हैं ।


2.बाहरी बवासीर 



इस प्रकार के बवासीर में मलद्वार के समीप छोटी छोटी गांठे बन जाती हैं जिनमें असीम दर्द होता हैं । ये गांठे रक्त के जमने से बनती हैं । कभी कभी इनसे रक्त भी निकलता हैं जिसके बाद रोगी को तीव्र दर्द महसूस होता हैं ।


बवासीर या अर्श के कारण :::


1.कब्ज :::



पेट में रहने से शोच के लिये अधिक दबाव लगाना पड़ता हैं । फलस्वरूप गुदामार्ग की रक्त नलिकाएँ फूलकर शोच में रुकावट पैदा करती हैं और दर्द के साथ खून निकलता हैं।


2.खराब जीवनशैली :::



लम्बें समय तक बैठकर काम करना। पैदल चलने का आभाव इस रोग को पैदा करने वाले सबसे प्रमुख कारक हैं ।


3.खराब खान - पान :::



भोजन करने की अनियमित जीवनशैली ,खाने में अधिक तीखा,मसालेदार और फास्टफुड लेना । सलाद,रेशेदार पदार्थों का भोजन में अभाव बवासीर के प्रमुख कारक हैं ।

अधिक अल्कोहल शीतल पदार्थों और तम्बाकू का सेवन भी इस रोग का प्रमुख कारण हैं ।




4.मंदाग्नि 



आयुर्वेद मतानुसार अर्श का मूल कारण मंदाग्नि हैं जब खाया हुआ भोजन अमाशय में पड़ा रहता हैं और इसमें स्थित रसो का पाचन अमाशय द्धारा नही हो पाता हैं तो यह भोजन अमाशय की चिकनाई खत्म कर कब्ज पैदा करता हैं । 


जब व्यक्ति मल बाहर निकालने के लिए जोर लगाता है तो मल द्धार और अमाशय की रक्तनलिकाओं में सूजन आ जाता हैं फलस्वरुप ये नलिकाएँ मलद्वार से बाहर लटकनें लगती हैं। 





लक्षण :::



१. गुदा मार्ग के आसपास और अंदर खुजली।


२.मलत्याग के समय खून निकलना और तीव्र वेदना ।


३.मल के साथ चिपचिपा स्त्राव।


४.मल त्यागते समय मस्से बाहर निकलना ।


५.बार बार शोच जाने की इच्छा के साथ गुदा में दर्द ।




# प्रबन्धन::-



१.अर्श कुठार रस, निसोठं,हरड.,चव्य, पिपली,सनाय पत्ती,चितृक को विशेष अनुपात मे मिलाकर रोगी को लगातार 6 माह तक सेवन करवाने से अर्श समाप्त हो जाता हैं.


२.अभयारिष्ट क्वाथ को चार चम्मच समान जल के साथ सुबह शाम भोजन के बाद सेवन करवाएँ.


३.कांकायन वटी ,अशोकवघ्न वटी को दो-दो के अनुपात मे मिलाकर रात को सेवन करवाएँ .


४.त्रिफला गुग्गल रात को सोते वक्त दो गोली उष्ण जल के साथ सेवन करें.


५.मधुयाष्ठि तेल दिन मे दो बार पृभावित स्थान पर लगाएँ.


६.कब्ज (constipation)न होनें दे.


७.छाछ में जीरा और नमक डालकर भोजन उपरांत पिने से बहुत लाभ मिलता हैं ।

• आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार नमक

८.नारियल की जटा निकालकर उसे जला ले ,इसे मक्खन के साथ मिलाकर सेवन करने से प्रथम अवस्था और द्वितीय अवस्था के रोगी को शतप्रतिशत आराम मिलता हैं ।


९.किशमिश को रातभर भिगोकर सुबह उसका जूस बनाकर सेवन करें ।


१०.भोजन में सलाद को अनिवार्य बनाने से यह बीमारी नही होती हैं ।


११.इस बीमारी से प्रभावितों को कपालभांति,पवनमुक्तासन,वज्रासन आदि अनिवार्य रूप से योगाचार्य के निर्देशन में करना चाहियें ।


१२.एलोवेरा,आँवला जूस का सेवन करने से रोग नहीं होता हैं ।


###कांकायन वटी (kankayan vati) :::


# घट़क (content) :::


० हरीतिकी (haritiki).

० कालीमिर्च (black pepper).

० जीरा (cumin).

० बड़ी इलायची (large cardamom).

० पीपरामूल (pepramul).

० चव्य (chavya).

० चित्रकमूल (chitrakmul).

० सौंठ (dry ginger).

० शुद्ध भिलावा (pure bhilava).

० जिमीकंद (jimikand).

० यवक्षार (yavkshar).

# रोगाधिकार (indication) :::


० खूनी बवासीर (piles).

० पीलिया (jaundice).

० पेटदर्द (abdominal pain).

० भूख में कमी या अपच (indigestion).

# मात्रा (Dosage) :::


छाछ या गर्म जल से वैघकीय परामर्श से.


• कब्ज का इलाज

• फैटी लीवर का आयुर्वेदिक इलाज


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