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जल प्रबंधन [WATER MANAGEMENT] आज की महती आवश्यकता

जल प्रबंधन [WATER MANAGEMENT] आज की महती आवश्यकता





भेड़ाघाट
 नर्मदा नदी 
भारत सहित दुनिया के सभी विकासशील देश चाहें वह अफ्रीकी राष्ट्र हो,लेटिन अमरीकी हो या एशियाई सभी पानी की गंभीर कमी से जूझ रहें हैं,इस कमी का मूल कारण जल का प्रबंधन नही कर पाना हैं.


उदाहरण के लिये भारत में प्रतिवर्ष 4,000 अरब घन मीटर पानी प्राप्त होता हैं.जो कि भारत समेत तमाम एशियाई राष्ट्रों की ज़रूरतों के लियें पर्याप्त हैं,लेकिन बेहतर प्रबंधन के अभाव में लगभग 1500 अरब घन मीटर जल बहकर समुद्र में चला जाता हैं.

यही 1500 अरब घन मीटर जल जब नदियों के माध्यम से बहता हैं,तो साथ में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा भी लाता हैं जिससे भारत में प्रतिवर्ष 30 करोड़ आबादी,करोड़ों पशु एँव अरबों रूपये की फसल बर्बाद होती हैं.इसी तरह पानी की कमी यानि सूखे से प्रतिवर्ष 10 करोड़ लोग प्रभावित होतें हैं.


भारत के पास दुनिया की आबादी का 18 प्रतिशत हैं जबकि दुनिया की कुल बारिश का मात्र 4 प्रतिशत बारिश भारत में होती हैं,इसी प्रकार भारत की प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में 133 वें स्थान पर है ।

 यहां प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी की उपलब्धता 140 लीटर है जबकि अन्तरराष्ट्रीय मानक 200 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का है। जिसका मतलब है कि भारत में जल की उपलब्धता बहुत कम है और ये स्थिति भारत को अफ्रीका, एशिया के अल्पविकसित देशों के समान खड़ी करती हैं ।



# बेहतर जल प्रबंधन कैसें हो :::




केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार भारत 4 हजार घनमीटर पानी में से मात्र 12 प्रतिशत यानि 480 घनमीटर ही सहज पाता है जबकि भारत की वार्षिक जल आवश्यकता 3000 घनमीटर की हैं । 



भारत की आबादी जिस अनुपात में बढ़ रहीं हैं उस हिसाब से यदि जल का प्रबंधन बेहतर तरीके से नहीं किया गया तो निकट भविष्य में एक बड़ा तबका प्यासा ही रह जायेगा। 



आईये जानतें हैं बेहतर जल प्रबंधन कैसे हो 

 1.बाढ़ प्रबंधन :::


यदि हम बाढ़ के पानी को नदियों के माध्यम से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाकर संचयित करनें की कार्यपृणाली को अपनायें तो न केवल सूखा प्रभावित क्षेंत्रों में पर्याप्त पानी की व्यवस्था हो जायेगी,बल्कि उन करोड़ों रूपयों की भी बचत होगी जो सरकार बाढ़ और सूखा राहत के नाम पर प्रतिवर्ष खर्च करती हैं.




# 2.पेड़ - पौधें बचायें नदियाँ :::


भारत में गंगा ,ब्रम्हपुत्र जैसी नदियों को छोड़ दे तो अधिकांश बढ़ी नदिया घनें जंगलों एँव पहाड़ों से निकलती हैं.ये घनें पेड़ पौधें वर्षा जल को मिट्टी में बांधकर उसे धिरें धिरें नालीयों के माध्यम से निचलें भागों की और रीसाते रहतें हैं,जब अनेक नालियाँ  एक जगह इकठ्ठी होती हैं,तो वही से नदियों का जन्म होता हैं,किन्तु पिछलें कुछ दशकों में इन नदी उद्गम स्रोतों के आसपास पेड़ - पौधों का कटाव इतना अधिक हुआ हैं,कि नदियों का प्राकृतिक जल प्रवाह लगभग समाप्त हो गया हैं,अब जो प्रवाह होता हैं,वह शहरों से निकलनें वालें गन्दें नालों के पानी का हैं,यदि नदियों के उद्गम स्रोतों के आसपास जंगलों का सफाया बंद नही हुआ तो ये नदियाँ गन्दें पानी के नालें ही बन जायेगी.




# 3.वर्षा जल पुन्रभंड़ारण द्वारा जल प्रबंधन :::

एक समय वर्षा जल को रोकनें की स्थाई पद्धति हमारें देश में काफी लोकप्रिय थी.और यह रूका हुआ जल वर्ष भर मानवीय प्रयोग में आता था.वर्षा जल को रोकनें वाली इन पद्धतियों में बावली काफी लोकप्रिय थी,किन्तु समय के साथ ये पद्धति विस्म्रत हो गई और इसका स्थान ट्यूबवेलों ने ग्रहण कर लिया इन ट्यूबवेलों से मनुष्य नें सिर्फ पानी उलीचना ही सीखा हैं,इन्हें वर्षाजल से रिचार्ज करनें का कोई विशेष प्रयत्न मनुष्य ने नही किया फलस्वरूप देश के लगभग 80% राज्यों में भूजल स्तर पाताल में पहुँच गया .आज 250 अरब घन मीटर सालाना दोहन के साथ दुनिया में भूजल दोहन करने वाला सबसे बड़ा देश है ।



परंपरागत बावलियों की एक विशेषता यह हैं,कि इन्हें मानवीय प्रयत्नों से रिचार्ज नही करना पड़ता एक बावली जिसका मुहँ आसमान की ओर खुला हो वर्षाजल से स्वंय रिचार्ज होती रहती हैं.

इसी प्रकार छोटें - छोंट़ें तालाब ,पहाड़ीयों पर बनें चेकडेम,कन्टूर वर्षाजल को पृथ्वी में सहेजनें के बेहतरीन माध्यम हैं.




# 4.जल का पुन: उपयोग :::


आज से 2000 वर्ष पूर्व जितना जल प्रथ्वी पर उपलब्ध था,लगभग वही जल आज भी उपलब्ध हैं,किन्तु तब प्रथ्वी की आबादी आज के मुकाबलें मात्र 1% ही थी,उदाहरण के लिये भारत में सन् 1947 में जल की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता 6000 घन मीटर थी,जो आज 1600 घन मीटर के आसपास ही बची हैं,ऐसे में जल का पुन्रउपयोग ही एकमात्र विकल्प बचता हैं,

जो मनुष्य को पर्याप्त मात्रा में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करवा सकता हैं.इसके लिये ऐसी तकनीकों का उपयोग किया जाना उचित होगा जो औघोगिक पानी,मलमूत्र का पानी,सिवेज के पानी को स्वच्छ पानी में बदल सकें ताकि इसका उपयोग बाहरी कार्यों में किया जा सकें,इस तरह यदि हम पानी का पुन्रउपयोग सीख गये तो 25% तक पानी की ख़पत कम हो जायेगी.



ऐसी ही तकनीक व्यापक स्तर पर समुद्र के पानी को पीनें लायक बनानें के काम लाई जा सकती हैं.जिससे समुद्र किनारें रहनें वालें या टापूओं पर रहनें वालें मनुष्यों को पीनें का साफ पानी मिल सकें.




आश्रम व्यवस्था के बारें में पूरी जानकारी





#5. बेहतर सिंचाई तकनीक द्वारा जल प्रबंधन



भारत में पानी का सबसे ज्यादा उपयोग सिंचाई के कार्यों में होता हैं,किन्तु हमारी सिंचाई तकनीक अत्यन्त पिछड़ी हुई हैं,इसी पिछड़ेपन की वज़ह से हमारी 60% जमीन बिना फसल उगायें पड़ी रहती हैं,यदि सिंचाई के क्षेंत्र में हम इजराइल का उदाहरण ले तो वहाँ मात्र 25 सेमी वार्षिक वर्षा होती हैं,किन्तु बेहतर तकनीकों की वजह से अधिकांश जमीन उपजाऊ हैं,जबकि भारत में इजराइल से चार गुना अधिक वर्षा होती हैं.



यदि ड्रीप पद्धति, स्प्रिंकिलर आदि के द्धारा सिंचाई की जायें तो पानी की बहुत बड़ी मात्रा बचाई जा सकती हैं,जिसका उपयोग बंजर भूमि में फसल उगाकर किया जा सकता हैं.

इसके अलावा क्षेंत्र आधारित फसलें उगाकर पानी की बचत की जा सकती हैं,क्षेत्र आधारित फसल से तात्पर्य जहाँ जितना अधिक पानी बरसता हैं,उतनें अधिक पानी की ज़रूरतों वाली फसल, इसके उलट कम वर्षा वालें क्षेंत्रों में कम पानी वाली फसलें उगाना चाहियें.



#6.पानी की रिसाइकिलिंग द्वारा जल प्रबंधन



घरों और फेक्टरीयों में इस्तेमाल होने वाला करीब 80% पानी बिना रिसाइकिलिंग ऐसे ही बहा दिया जाता हैं जोकि नदियों और तालाबों को प्रदूषित करता है । जबकि इस्त्राइल जैसा छोटा सा देश  इस्तेमाल किए गए पानी को 100% रिसाइकिल कर पुनः उपयोग करता है।


पानी की रिसाइकिलिंग तकनीक हमें गंभीरता से अपनानी पड़ेगी और इसे सभी के लिए अनिवार्य भी करना पड़ेगा तभी हम हमारी बढ़ती आबादी को भविष्य में गुणवत्तापूर्ण जल उपलब्ध करवा पायेंगे।




#7.ग्लोबल वार्मिंग में कमी लाकर जल प्रबंधन



मानव गतिविधियों के कारण पिछले 
तीन दशकों से जिस रफ़्तार से ग्लेशियर पिघल रहे हैं उससे कई नदियों के सामने अपना अस्तित्व बनाए रखने की चुनौती पैदा हो गई है। पिछले तीन सौ वर्षों में प्रथ्वी के तापमान में 0.5 प्रतिशत प्रति 100 साल की दर से वृद्धि हो रही हैं।

 जिसके कारण धरती के 70 प्रतिशत स्वच्छ जल के स्त्रोत 'ग्लेशियर' तेजी से पिघल रहे हैं, हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों की बात करें तो 18 वी सदी से आज तक ये 20 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिछे हट रहें हैं । उदाहरण के लिए उत्तराखंड में स्थित 'मिलम ग्लेशियर' 1957 से अब तक 1350 मीटर पिघल चुका है ।

यदि इन ग्लेशियरों से नदियों को सदानीरा रखना है तो हमें "पेरिस जलवायु संधि"क्योटो प्रोटोकॉल" जैसी अंर्तराष्ट्रीय संधियों को अविलंब ईमानदारी पूर्वक अमल में लाना होगा।

हरित ऊर्जा के स्रोतों को बढ़ावा देना होगा, व्यक्तिगत जीवन में भी ऐसी गतिविधियों को सीमित करना होगा जिनसे कार्बन उत्सर्जन अधिक होता हो ।


रासायनिक खेती का विकल्प प्राकृतिक खेती अपनाकर जल प्रबंधन

खेतों में प्रयुक्त रासायनिक खाद, रासायनिक कीटनाशक मिट्टी में मिलकर वर्षा के जल के साथ पानी के स्त्रोतों में मिल जातें हैं और पानी के स्त्रोतों को प्रदूषित करतें हैं। यही प्रदूषित पानी जिसमें ख़तरनाक रासायनिक तत्व मौजूद होते हैं कैंसर,त्वचा संबंधी रोग, फेफड़ों से संबंधित रोग और गर्भवती महिलाओं के भ्रूण संबंधित विकार पैदा करता है।

साथ ही इन रासायनिक तत्वों से जलीय जीव जंतु विलुप्त होने की कगार पर हैं।

अतः रासायनिक खेती की बजाय प्राकृतिक खेती अपनाकर हमें जल स्त्रोतों के साथ मानव और जलीय जीव जंतुओं को बचाना होगा।







वास्तव में पानी की बेहतर उपलब्धता बेहतर प्रबंधन पर ही निर्भर करती हैं. इसी कारण भारत सरकार ने केच द रेन catch the rain अभियान शुरू किया हैं जिसका लक्ष्य वर्षाजल  का प्रबंधन करना है।    जल की महत्ता को देखते हुए इसलिए    कहा गया हैं,कि "जल हैं तो कल हैं"

जल लोक सृष्टि का उपादान


पंच महाभूतों में एक जल भी हैं। जल ही लोक सृष्टि का उपादान हैं।जो जल हमें दिखाई पड़ता हैं वह अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। एक यौगिक हैं। प्रथ्वी भी पानी का ही एक रूपांतर हैं।पानी में वायु प्रवेश करके घनीभूत होता हुआ कालांतर में मिट्टी रूप में बदलता हैं।


अंतरिक्ष में भी प्राणात्मक पानी का ही साम्राज्य हैं।चंद्रमा भी पानी का ही विरल अवस्था रूप सोम का ही रूपान्तर हैं।जल पिंड हैं।

मृत्यु के देवता
 महाकाल

अंतरिक्ष का जल ही भिन्न- भिन्न लोकों के बीच सूत्र संबंध बनाए रखता हैं।जैसे हमारे तीन चौथाई जल है, वैसे ही पृथ्वी, चंद्रमा आदि पिंडो में भी तीन चौथाई जल होता हैं।सभी जड़ और चेतन भी इसी जल के कारण एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।जल में संग्रह करने की एक विशिष्ट शक्ति होती हैं। 

यह सभी ध्वनि तरंगों का संग्रह करता हैं।उसका परिवहन भी करता हैं।हम चाहें हरिद्वार या बनारस में गंगा स्नान करे, गौ मुख से गंगासागर की अनुभूति हो सकती हैं।लोगो के स्नान करने की, धोबी घाटो की,पूजा आरतियों की ध्वनियों पकड़ में आ सकती हैं।प्रत्येक डुबकी में अलग धरातल का अनुभव हो सकता हैं।

हमारे शब्दों का स्पंदन भी जल ग्रहण करता हैं।उसी के अनुरूप उसकी प्रतिक्रिया भी अनुभूत होती हैं।स्नान करते समय वह जल हमें पवित्र तो करेगा ही, गोमुख से गंगासागर तक जोड़े रखेगा।हमारे अर्ध्य को देवता तक पँहुचायेगा।उसी के अनुरुप शरीर के जल मे (रक्त मे) परिवर्तन आता जायेगा।

एक आसान प्रयोग से सिद्ध कर सकते हैं कि ध्वनि के स्पंदन जल को कैसे प्रभावित करते हैं।

दो बोतलों में साफ पानी भरकर ढक्कन लगा ले।दोनों को अलग अलग कक्ष में रखें।एक बोतल के सामने नित्य सुबह शाम प्रार्थना करें,जैसे अपने आराध्य की पूजा करते है।अच्छे वचन बोले।दूसरी बोतल के समक्ष नित्य अपशब्द बोलें।आप देखेंगे कि कुछ दिन बाद जिस बोतल के समक्ष प्रार्थना की, अच्छी बातें की उसके पानी का रंग बदलकर पीला केसरिया सा हो गया हैं।उसमे हल्की खुशबू भी आने लगी।दूसरी तरफ, जिस बोतल के समक्ष अपशब्द बोलें गये उसके पानी का रंग गन्दा सा मटमैला प्रतीत होने लगा।उस पानी में बदबू भी महसूस होगी।

हमारे शरीर की रचना में भी सत्तर प्रतिशत पानी हैं।ध्वनि के स्पंदन के प्रभाव से हमारा शरीर कैसे अछूता रह सकता हैं।प्राणमय कोश, मनोमय कोश, और अंततः आत्मा भी प्रभावित होती हैं।नकारात्मक स्पंदनों का प्रभाव असाध्य रोगों के रूप में परिलक्षित होता हैं।


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# अग्नि-सोम से सृष्टि ::::

पृथ्वी के जल को मर,चन्द्रमा के जल को श्रद्धा, सूर्य के जल को मरीचि, परमेष्ठी के जल को आप:तथा अंतरिक्ष के जल को अम्भस कहते हैं।वास्तव में जल की घन, तरल,विरल अवस्थाये हैं।हमारी सम्पूर्ण सृष्टि ही अग्नि और सोम(जल का ही रूप) से बनी हुई हैं।अग्नि में सोम की आहुति का नाम ही यज्ञ हैं।सोम जल जाता हैं, अग्नि शेष रहता हैं।हमारा सम्पूर्ण जीवन भी इसी प्रकार यज्ञ रूप आगे बढ़ता हैं।चन्द्रमा मन का स्वामी हैं।मन ही कामनाओं का केन्द्र हैं।मन की कामनाये प्राणों में हलचल पैदा करती हैं।प्राणों को ही देवता कहते हैं।वाक् अग्नि रुप बनती हैं।अतः सृष्टि में जो कुछ दृष्टिग़ोचर होता हैं,वह सारा निर्माण अग्नि रूप हैं।सूर्य भी अग्नि पिंड हैं,किंतु उसका पोषण अंतरिक्ष का जल ही (सोम) करता हैं।

सूर्य भी परमेष्ठी की परिकृमा करता है।एक परिक्रमा 25000 साल मे पूरी होती हैं।परमेष्ठी भी स्वंयभू मंड़ल की परिक्रमा करता हैं।इस व्यवस्था से तीन अग्नियों (अग्नि पिंडो) के मध्य दो सोम लोक बने रहते हैं।इन्हीं के कारण अग्नि का स्वरूप प्रतिष्टित रहता हैं।

सोम और जल दोनों ही अग्नि द्वारा भोग्य हैं।भोग्य पदार्थ को अन्न कहते हैं।भोक्ता अग्नि हैं।वर्षा का जल भोग्य हैं।पृथ्वी की अग्नि भोक्ता हैं।जो अन्न पैदा हुआ, वह भोग्य होगा, उसे खाने वाला शरीर भोक्ता होगा।शरीर में सप्त धातुओं का निर्माण होगा।अंतिम धातु शुक्र और रज भी क्रमश :सोम ओर अग्नि रूप होंगे।प्रकृति मे स्त्री को भले ही सौम्य बताकर भोग्या कहते हो।व्यहवार मे शुक्र रूप सोम ही रज रूप अग्नि में आहूत होता हैं।उसी से सृष्टि यज्ञ आगे बढ़ता है।जो निर्माण (सन्तान) होगा, अग्नि रूप होगा।

प्रदूषित नदियां (River) कही सभ्यताओं के अंत का संकेत तो नही 

विश्व की तमाम सभ्यताएँ नदियों के किनारें पल्लवित हुई हैं,चाहे मेसोपोटोमिया हो या हड़प्पा यदि नदिया नही होती तो न ये सभ्यताएँ होती और ना ही प्रथ्वी पर जीवन,आज भी  नील,अमेजान,गंगा,यमुना ,   नर्मदा,कृष्णा,कावेरी,गोदावरी,ब्रम्हपुत्र,क्षिप्रा,प्रणहिता,बेनगंगा जैसी नदिया मानव सभ्यताओं को विकसित करनें में अपना अमूल्य योददान दे रही है.


भारत में नदियों की महत्ता ने इन नदियों को माता के समान पूजनीय बनाया हैं,और इनकी स्तुति कई प्रकार के श्लोकों के साथ की गई हैं.


कही गंगे हर के उद्घघोष के साथ तो कही नमामि देवी नर्मदें त्वदीय पाद पंकजम् के साथ यह बतानें का प्रयत्न किया गया हैं,कि नदियों का हमारें जीवन में माँ के समान महत्व हैं.

प्रदूषित नदी
 प्रदूषित नदी

नदियों के किनारें लगनें वालें कुम्भ मेलों एँव इनके किनारें अवस्थित तीर्थों के माध्यम से भी यही कल्पना की गई हैं,कि व्यक्ति जीवन में कम से कम एक बार इन तीर्थों एँव मेलों में जाकर इन माँ समान नदियों का हालचाल जान लें कि क्या इनका जल वास्तव में आनें वाली पीढ़ी के जीवन जीनें की संभावना को बढ़ानें वाला हैं.

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बाघ बचायें जंगल

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यदि हम नदियों के प्रदूषण की बात करें तो आंकड़े बहुत ही भयावह तस्वीर प्रस्तुत करतें हैं,यदि स्थिति यही रही तो कुछ शताब्दियों में मानव भी अन्य जंतुओं के समान इस प्रथ्वी से विलुप्त हो जायें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी.


नदियों के प्रदूषित होनें का सबसे बड़ा कारण मानव मल मूत्र का इन नदियों में विसर्जन हैं,लगभग 80% नदिया इनमें मिलनें वाले सीवेज की वज़ह से गन्दे नालें में बदल गई हैं,और ये नदियां बहुत पूजनीय मानी गई हैं, ये नदियां हैं,गंगा,यमुना,क्षिप्रा,नर्मदा आदि.


केन्द्रीय प्रदूषण नियत्रंण बोर्ड़ के अनुसार भारत की लगभग सभी नदियों में घुलनशील आक्सीजन [DO] की मात्रा तय सीमा से काफी कम होती जा रही हैं,जैसे यमुना में यह 0 से 3 mg/litre तक तो गंगा में 0 से 15.5mg/L हैं.जबकि नियमानुसार इसका स्तर 20 mg/L होना आवश्यक हैं,तभी पानी मे जलीय जीव जन्तु जीवित रह सकतें हैं


Dissolved oxygen की कमी से पानी में बेक्टेरिया अधिक पनपते हैं और पानी गर्म हो जाता हैं.


घुलनशील आक्सीजन कम होनें का एक प्रमुख कारण औघोगिक अपशिष्ट,सीवेज और खेती में प्रयोग किये जानें वाले जहरीले रासायनिक पदार्थ हैं.


BOD (Biochemical oxygen demand) भी भारत की नदियों में काफी ख़तरनाक स्तर पर पँहुच गया हैं,इसका तय स्तर 3 mg/L माना गया हैं,जबकि यह भारत की सभी नदियों में 9 से 97 mg/L पाया गया हैं,



यह स्तर इन नदियों के जल को हाथ लगानें के भी खिलाफ हैं,यदि इस BOD स्तर वालें जल को खेती के कार्यों में उपयोग कर लिया जावें,तो जमीन बंजर होनें के साथ इससे पैदा होनें वाली फसलें खानें वाला व्यक्ति कैंसर, मस्तिष्क संबधित बीमारीयों,त्वचा संबधित बीमारियों,अस्थमा, से ग्रसित हो जाता हैं.


भारत में बहनें वाली प्रमुख नदियों जैसें गंगा,यमुना,खान,क्षिप्रा ,चम्बल के किनारें की औघोगिक ईकाईयाँ इतना जहरीला अपशिष्ट इन नदियों में में छोड़ रही हैं,कि इन नदियों का पानी पीनें वालें दुधारू पशुओं का दूध भी लेड़,आर्सेनिक,अमोनिया,जैसे ख़तरनाक तत्वों से संक्रमित पाया गया हैं.


एक अन्य महत्वपूर्ण स्तर टोट़ल कोलिफार्म की बात करें तो इसमें भी भारतीय नदिया ख़री नही उतरती इन नदियों में यह स्तर 500mpn/100 ml जल होना आवश्यक हैं,परन्तु यमुना,गंगा,कावेरी,चम्बल समेत तमाम नदियों में यह 5000 से 43000 mpn/100ml पाया गया हैं.

इसी कोलिफार्म की वज़ह से जलजनित बीमारियाँ डायरिया,पेचिस,पीलीया,टायफाइड़ ,पेट़ संबधित बीमारीयाँ भारत में सर्वाधिक हैं.और सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये इन बीमारीयों को नियत्रिंत करनें में ही खर्च कर देती हैं,जो धन के साथ के साथ मानव कार्यदिवसों का क्षरण करती हैं.


अमोनिया (NH3) मान्य स्तर नदियों के जल में 1.2mg/l होना चाहियें. इस मापदंड पर भारत की एक दो नदियों को छोड़कर कोई खरी नही उतरती जो नदिया इस मापदंड़ पर खरी उतरती हैं,इसका मूल कारण इन नदियों का बारहमासी बहाव नही होना और छोटे क्षेत्रफल पर बहना हैं.अन्यथा गंगा,यमुना,ब्रम्हपुत्र जैसी प्रमुख नदियों में यह स्तर 24.7mg/l तक हैं.

हाल ही में दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन टाक्सिक्स लिंक द्वारा " गंगा नदी में माइक्रोप्लास्टिक" पर एक अध्ययन करवाया गया है। 

इस अध्ययन के अनुसार  हरिद्वार से लेकर हल्दिया तक गंगा नदी में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। माइक्रोप्लास्टिक ऐसा प्लास्टिक हैं जिसका आकार 5 मिलीमीटर से कम होता है और जो आसानी से खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्य के शरीर में पंहुच जाता है। और कैंसर, आनुवांशिक समस्याएं, और स्वास्थ्य संबंधी बड़ी समस्याओं का कारण बनता हैं।



परिस्थितियाँ और आंकड़े गवाही खुद बयान कर रहें कि यदि अब नदियों को पुनर्जीवित नही किया गया तो हिरोशिमा नागाशाकी से भी बद्तर स्थिति में भारतीय सभ्यता पँहुच जायेगी,जिसका दोष सिर्फ और सिर्फ हमारा रहेगा.


० भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र


• जल के अचूक फायदे

                                     


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