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सांप्रदायिक सद्भाव [communal harmony] भारत का मूल भाव

हिन्दू मुस्लिम एकता
 साम्प्रदायिक सदभाव
वैदिक काल से ही भारत अनेकानेक संस्कृतियों,धर्मों,और धर्मावलम्बीयों का जन्मस्थान और पालनकर्ता रहा हैं.

चाहे वह हिन्दू धर्म हो,सिक्ख हो,बोद्ध हो  जैन धर्म हो या इस्लाम धर्म हो.इन धर्मों ने साथ पल्लवित होकर पिछली कई शताब्दीयों से साम्प्रदायिक सद्भाव की नई मिशालें पेश की हैं

किन्तु यदि इस साम्प्रदायिक सद्भावना का विश्लेषण पिछली शताब्दी में अंग्रेजों के आगमन से करें तो पायेंगें कि साम्प्रदायिक सद्भावना में उल्लेखनीय कमी दर्ज हुई हैं और इसका परिणाम भारत धर्म के नाम पर विभाजन के रूप में झेल चुका हैं.

पाकिस्तान जैसे मुल्क का जन्म धर्म के नाम पर भारत से अलग होकर हुआ. यह साम्प्रदायिकता आज भी भारत में कायम हैं,और लगातार बढ़ती ही जा रही हैं.

NCRB [राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड़ ब्यूरों ] के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष औसतन 750 साम्प्रदायिक दंगे होतें हैं,जिनमें जान माल का नुकसान तो होता ही हैं,किन्तु उससे बढ़ा नुकसान भारत की सदियों पुरानी सामाजिक संरचना को होता हैं,जिसमें मोहब्बत और भाईचारें का स्थान नफ़रत और घृणा ले लेता हैं.

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आईंये पड़ताल करतें हैं इन साम्प्रदायिक ताकतों के पनपनें की वज़हो की.

धार्मिक शिक्षण संस्थाएँ :::

महात्मा गांधी अन्य धर्मों के विचारों के सन्दर्भ में कहा करतें थे,कि अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन करना न केवल मानसिक दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी मनुष्य के लिये हितकारक होता हैं.

यदि वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो यह कथन अत्यन्त प्रासंगिक लगता हैं.हमारें देश में प्रत्येक धर्म की संस्थाएँ बच्चों को अपनें कुछ विशेष धर्मग्रंथो की शिक्षा देनें का कार्य कर रही हैं.

यह विशेष धर्मग्रंथों की शिक्षा भी पूरी तरह से न देकर ऐसे प्रसंगों तक सीमित कर दी जाती हैं,जिसमें कट्टरता ही सर्वव्यापक हो अर्थात अपनी संस्कृति श्रेष्ठ दूसरों की हीन जरा सोचिये इस तरह की शिक्षा ग्रहण करनें वाला बालक बड़ा होकर धर्मांध नही बनेगा तो क्या बनेगा ?

जब बालक को सभी धर्मग्रंथों की शिक्षा देनें की बात आती हैं,तो तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के विरोध की वज़ह से सरकारें ऐसे फैसलें लेनें  से पिछे हट जाती हैं .

स्वामी विवेकानंद ने धार्मिक शिक्षा के दृष्टिकोण से एक बात कही थी कि भारत का भावी धर्म वह होगा जिसमें वेदान्त का मन और इस्लाम का शरीर एकाकार होंगें.

# धर्मग्रंथों के अच्छे गुण पिछे कर दिये गये :

गुरूग्रंथ साहिब में लिखा हैं,कि " सच्चाई,संतोष और प्रेम का व्यहवार करें,सतनाम का सिमरन करें,अपने मन से पाप का विचार निकाल दें तब सच्च साहेब वाहेगुरू उनको सत्य का उपहार देगा"
कितनें उत्कृष्ट विचार हैं .

लगभग यही विचार अन्य धर्मग्रंथों और महापुरूषों के हैं.किंतु इन विचारों को तिरष्कृत करके उन विचारों को समझाया जानें लगा जिसमें दूसरें के धर्म को हीन और अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहा गया हो.


वैदिक ग्रंथों में लिखा हैं," आनों भद्रा : कृतवो यन्तु विश्वत:" अर्थात सभी ओर से सुंदर विचार आकर मन को संपुष्ट करें.


एक अन्य जगह लिखा हैं कि "संगच्छध्व संवदध्वंसं वो मनांसि जानताम्" अर्थात समाज में सभी समरसता के साथ आगे बढ़ें और साथ - साथ रहें.


इन्ही विचारों के दम पर दो हजार वर्षों से ईसाइ,बारह सौ वर्षों से पारसी और  पच्चीस सौ वर्षों से इस्लाम धर्म भारत में संपुष्ट होता रहा जबकि शक,हूण,किरात और मुस्लिम जैसें आक्रान्ताओं ने अपनी संस्कृति और धर्म एक दूसरें पर जबर्दस्ती थोपना चाहा.

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं.सामाजिकता उसे पूर्ण बनाती हैं,और समाज में रहकर दूसरों के प्रति सद्भावना उसे सम्पूर्ण बनाती हैं.

मात्र आचार - विचार,उपासना पद्धति, के आधार पर मनुष्यता में विभेद करना कोरी मूर्खता के सिवाय कुछ नही हैं.

इस सन्दर्भ में बाबर का उद्धरण देना चाहूंगा जो उसनें अपनी भूलों से सीखकर अपनें पुत्र हूमाँयू के वसियत नामें लिखा था, "हिन्दुस्तान में अनेकोनेक धर्म के लोग रहते हैं,भगवान को धन्यवाद दो कि तुम इस देश के बादशाह हो ,तुम निष्पक्ष होकर काम करना,जिस गाय को हिन्दू पूजनीय मानते हैं,उसका वध नही करवाना तथा किसी भी धर्म के पूजास्थल को नष्ट मत करवाना''

आज के वैश्वीकरण के दोर में जहाँ विश्व एकीकृत हो रहा हैं,एक दूसरें पर निर्भरता बढ़ती जा रही हैं,वहाँ भी धार्मिक दृष्टिकोण से मनुष्य अपने आप को बंद व्यवस्था में सीमित कर रहा हैं.

इसका मूल कारण अपने धर्मों को  दूसरें धर्म के प्रभाव से बचाना रहा हैं.यह बंद व्यवस्था तब तक नही खुल सकती जब तक की समाजीकरण की संस्थाएँ बच्चों को सिर्फ एक धर्म की शिक्षा में शिक्षित करती रहेगी.

इस प्रकार की व्यवस्था से समुदायों के बीच अविश्वास पनपता हैं,जो कालान्तर में साम्प्रदायिकता में परिवर्तित हो जाता हैं.
यदि समस्या का समाधान करना हैं,तो हमें भारत की प्राचीन परंपरा को पुन: सामाजिक जीवन में शामिल करना ही होगा जिसमें कहा गया हैं,कि
  " समानो मंत्र: समिती : समानी समानं मन: सह चित्तमेषाम् समानम् मंत्रमभिमंत्रवे व: समानेन वो हविषा जुहामि"
अर्थात हमारा मन ह्रदय एक हो,हम लोग सह अस्तित्व के साथ सबका कल्याण करतें रहे .




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